Thursday, August 20, 2009

बंद तो होनी ही हैं आँखे..क्या ख्वाब करना...
क्या अच्छा , क्या बुरा, क्या हिसाब करना ..!!

हम जो करते हैं...मर्ज़ी है खुदा की ही...
क्या छुपा है उस से..क्या हिजाब करना...!!

ये जरुरी नहीं की हर सवाल लाजिमी हो...
हर सवाल का क्या जवाब करना ...!!

इतनी बेदिली में भी ..जो मस्त जीये चले जातें हैं...
मेरे इस तकमील पर... कोई खिताब करना ...

बेरुखी इतनी, अच्छी नहीं..किसी सूरत-ए-हाल में ...
इतना तो मरासिम रखना, की आदाब करना...!!!

जो मुमकिन हो.. तो मत कर, इन लहरों से दिल्लगी 'साहिल'
जो खुद हों बेताब, उन्हें और क्या बेताब करना..!!




(हिजाब: veil; तकमील: achievement; खिताब: to give some name in honour;
मरासिम: relationship; आदाब: to greet)












5 comments:

Mani said...

"जहाँ भी होंगे अपने लिए जगह बना लेंगे हमको आता है हुनर दिल मैं उतर जाने का" ये पंक्तियाँतुम्हारे लिए लिखी गई हैं...हरफनमौला हों तुम....ये शायरी का जादू यूँ चले रखना....आमीन.

sunil said...

This one is best poetry from u till now.....you have improved tremendously....Each and every word is well placed and behave like a beautiful flower in a garland......gr8 work peeyush.....

noopur said...

its excellent....!!!
:)

noopur said...

kafi dino baad likhi hai.... magar..badi umda gazal likhi hai...!!!
;)

Mani said...

Aapne kaha ki "मेरे इस तकमील पर... कोई खिताब करना ..." to iss bar republic day main aap ko hathi pe bitha kar gold meddal se samanit kiya jaye ga...ta ki aap ye zindagi bhar yaad rakhye...mazak nahi sach keh rahe hain.....